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  • आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया !

    आभासी दुनिया न तो प्राकृतिक है साथ ही  साथ वास्तविक भी नहीं है।पर वास्तविक या प्राकृतिक दुनिया के मनुष्यों पर आभासी दुनिया का प्रभाव बेतहाशा बढ़ता ही जा रहा है।देखने, सुनने, समझने के साथ साथ मनुष्यों के मन मस्तिष्क पर आभासी दुनिया का प्रभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।वास्तविक दुनिया में रहते हुए…

  • भूतपूर्व होना या अभूतपूर्व बने रहना !

    भूतपूर्व होना यानी आकस्मिक रूप से या पदावधि समापन से जीवन में आयी बीती यादों या बातों को अपने शेष बचे जीवन का अभिन्न अंग बना लेना है। अभूतपूर्व होने या बने रहने में किसी याद या बात या पद के मिलने या निर्वाचित होने की अनिवार्यता का कोई लेना-देना ही नहीं है! भूतपूर्व होना…

  • गति, सद्गति, दुर्गति 

    गति का शाब्दिक अर्थ हैं किसी स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की क्रिया।सदगति याने सदा चलते रहने वाला जैसे सूर्य या हवा।दुर्गति का सामान्य अर्थ होता हैं बुरी गति या दुर्दशा।इस रूप में जीवन को समझें तो जीवन में भी हर पल यहीं क्रम दिखाई देता हैं।जन्म से मृत्यु तक जाने की क्रिया या…

  • स्त्री – पुरुष दोनों ही संपूर्ण मनुष्य हैं !

    जीवन के प्रारंभ से ही स्त्री पुरुष साथ साथ रहते आए हैं। मानव इतिहास के सारे संघर्षों में नर नारी का साथ रहा है। इसके बाद भी आज तक नर नारी के संबंधों में गैर बराबरी बढ़ती ही दिखाई देती है। आज का काल नारी सशक्तिकरण की दिशा में निरन्तर कदम बढ़ाते रहने वाला काल…

  • सर्वोदय, सम्पूर्ण क्रांति और लोकनायक के साथी रहे स्वाधीनता सेनानी एवं लोकतंत्र सेनानी दादाभाई नाईक ।

    आपातकाल में १९माह तक इन्दौर जिला जेल में मध्यप्रदेश के नौजवान पीढ़ी से लेकर स्वाधीनता संग्राम के भागीदार पीढ़ी के भागीदार वरिष्ठ आयु के सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता की एक अच्छी खासी श्रृंखला भी शामिल थी। जिसमें आयु एवं अनुभव में अग्रणी सर्वोदय आन्दोलन के वरिष्ठतम रचनात्मक कार्यकर्ता, विसर्जन आश्रम के अध्यक्ष एवं स्वाधीनता सेनानी श्री…

  • जीवन एक उत्सव है तो वन महोत्सव है !

    वन और जीवन हमारी धरती का कभी न खत्म होने वाला या अंतहीन प्राकृतिक गति विधियों  का जीवंत सिलसिला है। यदि धरती पर हम जीवन को उत्सव माने तो धरती पर हर कहीं फैले वनों को जीवन का अनन्त महोत्सव कह सकते हैं। मनुष्य का यह मूल स्वभाव है कि वह शांत या गतिविधि विहीन…

  • सृष्टि का आनंद बनाम आनंद की सृष्टि !

    सृष्टि मूलतः विराट नैसर्गिक ऊर्जा के अनन्त अद्भुत आनंद की प्रत्यक्ष अनुभूति हैं। आनंद का विस्तार सूक्ष्म रूप से समूची सृष्टि में व्याप्त है। आनंद मनुष्य के मन मात्र में ही नहीं मनुष्यों के समूचे चिंतन,मनन, सृजन से लेकर संपूर्ण जगत में स्थित वनस्पति जगत और प्राणी जगत में कई रूपों में जैसे जलचर, थलचर…

  • मानवीय सवालों की सुनामी में बढ़ती समाधान शून्यता !

    बहुआयामी लोकतांत्रिक व्यवस्था  हो या सैनिक शासन सहित चाहे राजशाही भी क्यों न हो किसी भी तरह की शासन व्यवस्था नित नये अनसुलझे या खड़े हो रहे सवालों के बोझ तले तेजी से सारी मनुष्य निर्मित व्यवस्थाएं एक तरह से ढहती जा रही है या समाधान शून्यता की दिशा में निरंतर बढ़ती ही जा रही…

  • मनुष्यों और मनुष्येतर दुनिया की प्रकृति और जीवन प्रवाह

    हमारी आज की दुनिया में मनुष्य और मनुष्येतर जीवन की प्रकृति और प्रवृत्तियां एक दम भिन्न है। मनुष्य की हलचले बुद्धि केन्द्रीत ज्यादा है तो मनुष्येतर हलचलें ज्यादातर भोजन केन्द्रित मुख्यतः भूख और भक्षण को लेकर ही होती है। मनुष्येतर जीवन के पास ध्वनि तो है पर मनुष्य जैसी भाषा संवाद कला या पद्धति विकसित…

  • इन्दौर में जीवन शैली की तरह ही राजनीति भी बदल गई है !

    जब देश आजाद हुआ तब देश के साथ इन्दौर में भी राजनीतिक सोच समझ और गतिविधियों में सद्भाव सहयोग और उत्साह का वातावरण दिखाई देता था।आज के कालखंड के मुकाबले दैनंदिन राजनीतिक गतिविधियों की तासीर में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। इन्दौर ही क्या समूची देशव्यापी जीवन शैली में जिस तरह बदलाव हुआ…